शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

कृष्ण संवाद, गुरु शिष्य परंपरा, आत्मचिंतन, स्वाध्याय

यह Blog केवल कविताओं का संग्रह नहीं है, 
यह एक आंतरिक यात्रा है —
मीरा की तड़प से राधा के भाव तक,
कृष्ण से सखा-सम्वाद तक,
गुरु से शिष्य के मौन मिलन तक।

यहाँ ईश्वर कोई दूर खड़ा देवता नहीं,
वह सखा है, संवाद है, चेतना का स्पंदन है।
यहाँ राधा केवल एक चरित्र नहीं,
वह प्रेम की वह अवस्था है
जहाँ “मुझमें-तुझमें भेद कहाँ” का अनुभव होता है।

इन लेखों और काव्यों में —
संस्कारों पर चिंतन है,
सत्–रज–तम से परे जाने का आमंत्रण है,
देह-भाव से चैतन्य तक की यात्रा है।

यहाँ गुरु-शिष्य संबंध केवल बाहरी नहीं,
अंतरात्मा का जागरण है।
यहाँ स्वाध्याय का अर्थ है —
स्वयं को पढ़ना,
दूसरों को नहीं।

यह ब्लॉग प्रश्नों से भागता नहीं,
बल्कि भीतर झाँकने का साहस देता है।
यहाँ प्रेम कोई भावना मात्र नहीं,
वह ब्रह्मांडीय ऊर्जा है —
अकारण, अनंत, और प्रमाण से परे।

यदि आप भी कभी
ईश्वर से बात करते हैं,
कृष्ण को सखा मानते हैं,
राधा-भाव में डूबते हैं,
या गुरु के चरणों में स्वयं को पिघलता हुआ पाते हैं —
तो यह स्थान आपके लिए है।

यहाँ शब्द माध्यम हैं,
मौन गंतव्य है।

🌿 स्वागत है उस यात्रा में
जहाँ आत्मा स्वयं को पहचानती है
और प्रेम ही परमात्मा हो जाता है।


कृष्ण-संवाद: क्या है चिंतन का वास्तविक स्वरूप?

चिंतन का विज्ञान: देह के पार कृष्ण का अहसास चित्त और चिंतन: आत्मनिर्माण और चरित्र का मूल कर्म से परे चिंतन: जब गुरु और इष्ट ही बन जाएं हम...