शनिवार, 23 मई 2026

गुरुदेव की लेखनी से बहता प्रेम प्रवाह, स्वाध्याय से प्रचार तक की आत्मनिर्माण यात्रा

युगनिर्माण, स्वाध्याय और प्रेम विस्तार के बीच गुरुकृपा से बहती चेतना की कथा

  1. गुरुचरणों में समर्पित जीवन, साहित्य प्रचार और प्रेम ऊर्जा का दिव्य विस्तार

  2. जब गुरुदेव ने कहा — “आचार नहीं डालना , जन जन तक पहुंचाओ प्रेम रूपी साहित्य धारा”

  3. स्वाध्याय से समष्टि तक — गुरुदेव की प्रेरणा से बहती प्रेम, सेवा और युगनिर्माण यात्रा

भूमिका



जब कोई कार्य अहंकार, प्रसिद्धि या प्राप्ति के लिए नहीं…
बल्कि केवल गुरु आज्ञा, प्रेम, स्वाध्याय और आत्मनिर्माण के भाव से होता है…
तो वही कार्य धीरे-धीरे युगनिर्माण की ऊर्जा बन जाता है।

यह काव्य केवल एक YouTube यात्रा या साहित्य प्रचार की कहानी नहीं…
बल्कि उस सूक्ष्म भाव का अनुभव है,
जहाँ गुरुदेव स्वयं अपनी बिटिया को साधते, गढ़ते और माध्यम बनाते दिखाई देते हैं।

अगर आप भी कभी सोचते हैं —
“जो मैं कर रहा हूँ उससे वास्तव में क्या होगा?”
तो संभव है इस काव्य में आपको उसका उत्तर मिल जाए।

Higlights

गुरुदेव बोले — “इनका अचार डालेगी क्या?”
स्वाध्याय से शुरू हुई प्रेम प्रचार की यात्रा
2177 वीडियो…और लक्ष्य फिर भी शून्य
youtube नहीं…ये गुरुकृपा का प्रवाह है
जहां प्रचार नहीं, प्रेम विस्तार मूल हो
महाकाल अपनी बिटिया से काम ले रहा है
लोकेषणा नहीं…बस गुरु आज्ञा आधार है
साहित्य तभी जीवित होता है जब प्रेम से जिया जाए
पहले आत्मनिर्माण…फिर स्वयं समष्टि निर्माण
ये चैनल नहीं…गुरुदेव की चलती हुई चेतना है


गुरुदेव की लेखनी से बहता प्रेम प्रवाह, स्वाध्याय से प्रचार तक की आत्मनिर्माण यात्रा

गुरुदेव बस ये बता दीजिए के वाकई कुछ लिखना है क्या?
एक पल का भाव था उसे भी वाकई अभिव्यक्त होना है क्या?

गुरुदेव बोले भाव एक पल का था
लेकिन ये भाव तो कई के मन मै हो सकता
तो भाव को उत्तर तो मिले यहां बिटिया
इसलिये अब सहज बहने दे कृष्ण की प्रेम ऊर्जा यहां

और बस ढीला छूट गया
जब लिखना है जो लिखना है लिख देना केशवा

ये बीती रात लिखा गया और सो गए
अब पुनः चिंतन चला

ये देह सारा दिन करती है क्या
कोई कॉर्पोरेट नौकरी..बिसनेस नहीं
कोई साधन पैसे जुटाने कमाने का नहीं
लेकिन काम तो सारा दिन का है यहां
और कमी किसी चीज की नहीं
क्योंकि गुरुदेव माताजी है परमपिता
स्वाबलंबन है, लेकिन नियम नहीं
दिल से दिल की आवाज कहीं
और सब कुछ सहज मैनेज
घर परिवार साथियों के साथ से होता सदा, आयाम हो चाहे कोई भी यहाँ

बीते कल जब youtube चैनल पर कुछ कुछ काम कर रहे थे
तो विचार मन मै ये उठा रहा था
गुरुदेव इस सबसे क्या होगा
क्या वाकई इससे युगनिर्माण होगा?

आत्मनिर्माण तो हो रहा इसमें कोई संशय नहीं यहां
पल पल गुरुदेव माताजी के सानिध्य मै कुछ तो दिव्य नया सीखते उसकी ऊर्जा को महसूस करते है
और उसके लिए सदा इस youtube का और youtube परिवार का भी आभार करते है

ये चैनल किसी कमाई का साधन नहीं है यहां
और ना ही इसका लक्ष्य कभी कमाई और मेंबर काउंट (Subscriber Count) रहा
इसको खोलने के पीछे भी नहीं रही कभी कोई इच्छा
क्योंकि इच्छा भी उसी काम की होती है जो थोड़ा बहुत कहीं आता हो

जैसे इस पल यहां बैठे बैठे ऐसे इच्छा नहीं हो सकती
के मै देश की PM बन जाऊं
क्योंकि पता है योग्यता नहीं
Globally कुछ समझ इस पल तक नहीं

ऐसे ही चैनल बनाने की इच्छा किसी क्रिएटिव व्यक्ति को हो सकती है
लेकिन मेरे जैसे को तो नहीं जिसे कोई दूर दूर इस फील्ड के अक्षर का भी था ज्ञान नहीं

तो निश्चित वो गुरुदेव की आज्ञा थी
2021 मै जब संदेश आया था
तो गुरुदेव के चरणों मै रखकर मन मुस्कुराया था
गुरुदेव ये सब तो आता नहीं
आप कह रहे है तो आप ही व्यवस्था करो स्वयं ही

और फिर सूक्ष्म की चिट्ठी समूहों के साथियों को दी
और एक भइया ने कहा
आप बस ऑडियो बना दीजिए दीदी
जैसे आप देवपरिवार के लिए बनाती है
बाकी सब हम देख लेंगे

और हंसी आ गई
गुरुजी तो बहुत मैजिकल है
कैसे कैसे काम करते है

और तब से आज तक एक अनवरत गहन
स्वाध्याय की यात्रा चली

आत्मविश्वास कैसे बढ़ाएं से लेकर
जन्मशताब्दी पुस्तक माला, गुरुदेव की वाणी के प्रवचनों के दिव्य देव संग्रह पढ़ा
और बस ये 100 किताबें ही नहीं
मैं क्या हूं, प्रेमयोग, आत्मा परमात्मा का मिलन संजोग
कृष्ण भक्ति, मां आनंदमई का चिंतन, गोपी भाव
जाने कितना कुछ पढ़ा गया जनाब

और पढ़ा नहीं, गहन चिंतन मनन हुआ
समूह की शक्ति गुरुदेव के आशीर्वाद से
पढ़ा हुआ व्यवहार मै उतरने लगा

स्वाध्याय का ये क्रम जो देवपरिवार से शुरू हुआ
इस पल तक अपने विस्तार पर है यहां
और इसके लिए इतना आभार है ब्रह्मांड का
हर पल हृदय कृतज्ञता महसूस करता

लेकिन शुरू के कुछ साल बस रिकॉर्डिंग मै बीते
और भाव बस स्वाध्याय का
जब तक गुरुदेव ने ध्यान की अनंत गहराइयों से ये महसूस नहीं करवाया के प्रचार भी आवश्यक है यहां

इसके बाद ये भाव काव्य रुक गया

कुछ एक घंटे बाद -
लेकिन अब इस पल महसूस हुआ
ये तो बहकर ही रहेगा
कारण तो नहीं पता

और इस काव्य में समष्टि के लिए कुछ है या नहीं जानते नहीं
लेकिन इस पल इस हृदय मै बस गुरु का चिंतन गहरा हो रहा
और कृष्ण प्रेम महसूस हो रहा
माताजी की वात्सल्य ऊर्जा से मानो देह रूपी बैग पूर्ण भरा हुआ

क्योंकि कृपा बिना कुछ चंद मिनटों मै ऐसा काव्य लिखा नहीं जा सकता
और जीवन का सर्वोत्तम पल वही होता है
जिसका आधार गुरु और विस्तार कृष्ण हो
जिसकी नींव बस प्रेम वात्सल्य करुणा हो

और फिर इसी क्रम में आगे
कान्हा लिखने लगे

कैसे गुरुदेव ने संत तुलसीदास जी के उदाहरण से प्रचार का महत्व समझाया यहां

उन्होंने रामचरितमानस लिखी और सहज भक्ति मै खो गए
और तब महाकाल ने कहा
ये क्या हो रहा है रामबोला
मात्र लिखा पर्याप्त नहीं होगा यहां
जीवन भर करो प्रचार प्रसार इस राम कथा का

और आशीर्वाद तुलसी की रामायण को अमृत्व का मिला
के जब जब जहां जहां होगी रामकथा
अंजनी नंदन सदा होंगे वहां

रामचरितमानस धर्मग्रन्थ बन गई और आज तक उसे पढ़कर आनंद होता सदा

और इसके बाद हृदय रोने लगा
अश्रु रुके नहीं

आगे जब गुरुदेव ने कुछ 2 वर्ष पहले शायद पूछा कहा
बेटा कितने वीडियो है चैनल पर
और हमने छोटे बच्चे वाले गर्व से खिलखिलाकर कहा 1200 होंगे गुरुजी

और गुरुजी ने ज़ोर से हुंकार भरी और कहा
तो इनका अचार डालेगी क्या
अरे इनको जन जन तक लेकर जाना भी तो आवश्यक है गुड़िया

कितनो तक जाएंगे तुम इसकी परवाह नहीं करना
तुम लेकिन कर्म तो करो बीज रूप से अपना

और वहां से शुरू हुई Channel के प्रचार की यात्रा

आज चैनल पर साथी जो डायरेक्ट जुड़े है
4800 (Subscriber) के आस पास है
सोचा नहीं था इतने भी होंगे कभी
और आगे ये परिवार कितना होगा जानते नहीं

देवपरिवार के साथियों को भी आभार है यहां
आपके माध्यम से
आपके साथ आशीर्वाद से
आपके होने के कारण
ही प्रश्नोत्तरी सीरीज बना
उपासना समर्पण योग का स्वाध्याय पूर्ण हुआ
महाकाल की युगपरिवर्तन प्रक्रिया से गुरुदेव को और गहरा आत्मसात किया
आत्मनिर्माण के सूत्र निज जीवन से को अपने अनंत स्नेह प्रेम सम्मान दिया
और गुरुदेव का Shreepriya Counselling Channel इसी प्रेम के एक और स्वरूप यहां

और आज इस पर 2177 वीडियो है
और जाने कितने आने तैयार है

और अब तो ये नई यात्रा शुरू हुई (2 साल पहले)
क्योंकि प्रचार तो कभी सोचा ही नहीं
ध्यान सदा स्वाध्याय और आत्मनिर्माण पर रहा

लेकिन गुरुदेव की लीला
काम आया तो साथी भी मिले

जितने भी वीडियो है चैनल पर
समूह के साथियों ने मिलकर एक एक वीडियो के नोट्स बनाकर दिए
इस समय तक ये AI नहीं आया था
या आया होगा तो पता नहीं था

सब काम बहुत समय लेता था
हालांकि उसी मै आत्मनिर्माण छुपा था

और आज भी हर काम AI से नहीं हो पाता

अब एक एक वीडियो पर नए सिरे से काम चल रहा है
सबके टाइटिल डिस्क्रिप्शन कवर पेज बदल रहे है
और इसी क्रम में बस सीखते चल रहे है

जिसे एकदम कुछ ना आता हो
उसके लिए ये सफर सरल नहीं

ऐसे मै youtube से लेकर canva filmora सीखने की यात्रा चली
लगा गुरुदेव इतना तो स्कूल मै नहीं मेहनत हुई
जितना अब 44 पार पर चल रही

हंसी आने लगी
क्योंकि इसी बीच एक और Baby आ गया
छोटा पैकेट बड़ा धमाका
Awgp Vangmay Channel का जन्म हुआ
जिसका उद्देश्य गुरुदेव के वाङ्मय को ऑडियो मै कन्वर्ट करना
और काम चल रहा नियमित साझेदारी है यहां
ये भी बस कृपा और समूह की शक्ति यहां

इसी क्रम में बीते कल जब चैनल के पहले के Data
JSPM जन्मशताब्दी के प्रवचन डेटा को सही कर रहे थे
तो सोचने लगे

गुरुदेव इससे क्या होगा
क्या वाकई इससे युगनिर्माण हो जाएगा?

विचार आया और गया
गुरुचरणों में रखा गया
क्योंकि लगा कुछ है या नहीं
ये सब करके गुरुदेव का चिंतन होता है
उनकी लेखनी ही उनका स्वरूप है
उसी के बीच घूमते रहते है

और क्योंकि मूल नींव ऊर्जा
ना तो सब्सक्राइबर काउंट बढ़ाना है
ना लाइक के पीछे का पागलपन
और ना पैसे के लिए काम ये चल रहा यहां

तो चिंतन बस स्वयं के निर्माण पर होता
एक एक लाइन पर जांच होती है सदा
बस अन्तर्जगत की यात्रा ये यहां

हालांकि अपना काम अच्छे से करना है
इनपुट उत्साह प्रेम शुद्धता और शिद्दत से जाता
और एक एक लाइक सबक्राईब कमेंट के लिए Gratitude आता

जहां से जो आ जाए सब महकाल को स्वयं अर्पित हो जाता
क्योंकि मेरा कुछ है ही नहीं यहां
जीवन से गुरुदेव हटा दो तो कुछ भी नहीं बचेगा

अब गुरुदेव ने मुस्कुरा कर कहा

इससे युगनिर्माण होगा या नहीं ये तो नहीं पता बिटिया

लेकिन इस सबसे मेरी एक बेटी का निर्माण हुआ

के मुझे गर्व है अपनी इस बेटी पर यहां

अपना दीपक आप बनो को जिसने सतत जिया

इस बेटी के हृदय रूपी प्रेम दीप अखंड रूप से प्रकाशित रहे सदा

यही इस पल तेरे गुरुदेव माताजी का आशीर्वाद और जगतजननी आदिशक्ति मां गायत्री से प्रार्थना

बेटे, माताजी ने तो बस यही कहा

पहले अपना निर्माण करो

और फिर तुम स्वयं बह जाओगे

क्योंकि तुम ही ना रह जाओगे

और वही से सब काम स्वयं हो जाएगा

ये जो सब साथी परिजन (Subscriber )इन तीन चैनल पर से सब सुनते है 
इन सबका कितना निर्माण कैसे और कहां हुआ
इसका अंदाजा तुम नहीं लगा पाओगी बिटिया

इसलिए तुम बस सदा की तरह कहना मानो और चलो

लक्ष्य तुम्हारा कुछ है ही नहीं

तुम्हारा लक्ष्य तो बस गुरु का कहना मानना सदा

इसी के आधार पर चलते चलना बिटिया
आगे तो तुम्हारा ये गुरु इस देह को अपना
यंत्र, तीर, ढोलक, ढपली, शंख
बनाकर, अपना लक्ष्य साध ही लेगा
जैसे इस पल कर रहा

आगे गुरुदेव ने कई सारे साथियों को संबोधित करते हुए कहा - 

जो भी बच्चे युगनिर्माण का काम, साहित्य का

प्रचार प्रसार कर रहे है

सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं साधुवाद आभार

यूं तो ये बात आप सबके अंतःकरण मै कई कई बार कही गई है

पर पुनः एकबार दोहरा रहे है

आपको अच्छी लगे तो स्वीकार कीजिए

नहीं समझे तो भी कोई बात नहीं

इस देह के माध्यम से कह रहे आपके गुरूवर ही

आप सब बहुत अच्छा कर रहे है

करते रहिये

लेकिन जो कर रहे है

वो क्यों कर रहे है इस पर भी गहन विचार कीजिए

साहित्य के प्रचार का उद्देश्य मात्र प्रचार नहीं

प्रेम का विस्तार है

और प्रेम बस देने की एक भावना सदा

प्रेम मै लेना देना नहीं होता

तो साहित्य रूपी इस प्रेम गंगा का प्रचार से पहले विस्तार करें

अपने अंतर्करण मै इसको इस प्रकार धारण करें

के ये सत्य हो जाए अस्तित्व चेतना का

गुण कर्म स्वभाव व्यवहार का

जब ये होगा तो भीतर प्रेम ही प्रेम महसूस होगा

और जब ये प्रेम की नींव से साहित्य का विस्तार होगा

तो उसका महत्व प्रचार से कई गुना हो जायेगा

एक एक चेतना मै ये अलख जगायेगा

और आपका नींव और मूल सही होगा

तो लोभ मोह लालच अहंकार किसी प्रकार नहीं सताएगा

लोकेषणा के विष को पचाना सरल नहीं होता

इसलिए समर्पण शरणागति ही रास्ता सदा

आप सबने ये काव्य यहां तक पढ़ लिया

ये भी बहुत बड़ी बात है यहां

अब ध्यान से इस काव्य के भाव की गहराई को देखिए
आप मेरा जो भी कार्य कर रहे
उसमें इस काव्य भावना के अमृत को जोड़ दीजिए

और पहले से यही जी रहे तो इस भावना का महत्व आप समझते है

इस बिटिया को अपना स्नेह आशीष सहयोग साथ दीजिए
क्योंकि जो तो आप रहे है
लेकिन फिर भी काव्य यहां से बह गया
इस देह की ये नहीं थी चाहा
बस ढीला छूटा और बह गया

ये लेखनी दो चार दिन या  कई कई घंटे लगकर नहीं आई है
ये मात्र एक घंटे के समय मै बह गई
वो भी तब जब देह से बिटिया घर के भी कुछ कुछ काम कर रही थी

यहां बात आपको मानाने या प्रमाण देने की नहीं
के ये लेखनी भी इस बच्ची के गुरुदेव आपके महाकाल कहीं
क्योंकि सत्य स्वयं प्रकाशित है
और उसके प्रकाश को रोकना संभव नहीं

ये Channel कितनो तक जायेगा
इसकी परवाह इस बिटिया को नहीं
लेकिन महाकाल इस प्रेम प्रवाह को निश्चित ही गति देगा
और आप इसमें साथ दे सकते है
आपकी चाहा और रजा
आपका साथ एक आशीर्वाद है

चाहे तो एक experiment अपने गुरु के शरणागत होकर कीजिए

बस 40 दिन और हर दिन दो ऑडियो रोज के सुन लीजिए

आपकी आत्मा को उत्तर स्वयं मिल जाएगा

के यहां ऐसा खास विशेष अलग है क्या

बाकी ऐसा नहीं के ये केवल यहीं है

बाकी जगह भी है, होने की संभावना है

लेकिन इस पल बात बस यहां की हो रही है

आप सुनिए और महसूस कीजिये

आपका मन स्वयं इस भावना के विस्तार से जुड़ जाएगा

बिटिया की और से सभी को यथायोग्य प्रणाम
राधे राधे शारदे जगज्जननी जगदंबा
और महाकाल का स्नेह आशीष सबके संग सदा
हर जीवन को मिले दैवीय दिव्य दिशा
यही एक प्रार्थना आदिशक्ति मां गायत्री से बारंबार यहां

काव्य बह गया
और हम स्तब्ध इस पल यहां
कहने को कुछ नहीं रहा
पूर्ण मौन से ग्रहण कर रहे है इस
पल की ऊर्जा और भावना का प्रवाह

गुरुदेव आपको प्रणाम सदा सदा
राधे राधे शारदे जगज्जननी जगदंबा 

10.18 AM 24 May 2026


आध्यात्मिक चिंतन बिन्दु

  • आत्मनिर्माण ही समष्टि निर्माण की प्रथम सीढ़ी है।

  • साहित्य का प्रचार नहीं, प्रेम का विस्तार मूल उद्देश्य होना चाहिए।

  • गुरुकृपा जब कार्य करवाती है तब योग्यता से अधिक शरणागति काम करती है।

  • स्वाध्याय यदि व्यवहार में उतर जाए तो वही चेतना परिवर्तन बनता है।

  • लोकेषणा का विष केवल समर्पण और शरणागति से पचता है।

  • जो कार्य अहंकार रहित होकर किया जाए वही युगनिर्माण का माध्यम बनता है।

  • गुरु जब किसी को यंत्र बनाते हैं तब साधारण जीवन भी दिव्य हो जाता है।

  • प्रेम से किया गया प्रचार चेतना में स्थायी प्रभाव छोड़ता है।

  • जहां लक्ष्य स्वयं नहीं, गुरु आज्ञा हो — वहीं साधना पूर्णता की ओर बढ़ती है।

  • सच्चा कार्य वही है जिसमें “मैं” धीरे धीरे विलीन होने लगे।


समापन 

कई बार हम सोचते हैं — “हमारे छोटे से प्रयास से क्या बदल जाएगा?”
लेकिन शायद…
युगनिर्माण पहले संसार में नहीं,
एक हृदय में शुरू होता है।

और जब एक हृदय सच में गुरुचरणों में समर्पित हो जाता है…
तो वही प्रेम धीरे-धीरे अनगिनत चेतनाओं तक पहुँचने लगता है।


“साहित्य प्रचार का उद्देश्य प्रसिद्धि नहीं…प्रेम को चेतना से चेतना तक पहुंचाना है।”

जब मन कहे “सब छोड़ दो” | अकारण प्रेम ने विचारों को कैसे परास्त किया

Phone नहीं, प्रेम जुड़ाव का आधार है | महाकाल की चेतना और अहंकार का संवाद


भूमिका



जब कभी मन में अचानक सबसे कट जाने, फोन switch off कर देने, या स्वयं को समेट लेने के भाव उठें —
तो संभव है यह काव्य आपको भीतर के उन विचारों को समझने और उनसे प्रेमपूर्वक बाहर आने का एक नया दृष्टिकोण दे।

यह काव्य उन सूक्ष्म मानसिक विचारों और भावनात्मक तरंगों का सजीव चित्रण है, जो कभी-कभी साधना पथ पर चलते हुए भीतर तीव्र दबाव उत्पन्न करती हैं।

लेकिन यहाँ एक साधक उन विचारों से भागता नहीं, बल्कि सीधे संवाद करता है — और प्रेम, गुरुकृपा तथा आत्मचेतना के आधार पर उनके भ्रम को तोड़ देता है।

यह काव्य केवल “फोन बंद करने” के विचार का उत्तर नहीं, बल्कि उस अहंकार, अपेक्षा और ध्यान पाने की चाह का समाधान है जो मन के भीतर सूक्ष्म रूप से जन्म लेती रहती है।


काव्य

कल से लेकर इस पल तक
हजारों बार बस एक ही धुन सवार हो जाती है —
के फोन ऑफ कर दो।

अब लगा
इस विचार को address करते हैं।
इससे ज़रा दो-दो हाथ करते हैं।

ऐसे काम में मन लगाकर,
इधर-उधर स्वयं को अटकाकर
इस विचार से पीछा छुड़ाना कठिन है।

ये बार-बार है,
और हर बार करता तेज प्रहार है।

तो विचार जी, सुनिए —

आप जहां से भी आ रहे हैं,
जिस भी लोक से पधारे हैं,
उधर ही वापस चले जाएं।

यहां आपका कोई काम नहीं।

आपकी दाल यहां गलने वाली भी नहीं।

कारण —
एक तो जब आप आते हैं और कहते हैं
“फोन बंद कर लो”,

तो माना — आप बहुत तीव्र होते हैं।

लेकिन हमको आपसे ये पूछना है —
क्यों करें बंद फोन?

हम हैं कौन?

हम कोई देश के प्रधानमंत्री हैं
के हमारे फोन बंद करने से देश रुक जाएगा?

अरे, धूल का एक कण नहीं हम यहां।

और हमारे साथी हमारा ब्रह्मांड हैं,
और हम उनका।

तो फोन बंद करने से
कुछ बदलने वाला नहीं यहां।

आप एकदम मूर्ख हैं विचार भइया।

आपको क्या लगता है —
ये फोन हृदय की भावनाओं का आधार है?

अरे, ये फोन तो एक device है।
डब्बा...
जिसके लिए आभार है यहां।

ऐ प्यारे फोन भइया, seriously मत लेना।

वो तो विचार को बताना है
के फोन का महत्व फोन चलाने वाले से है।

और यहां
इस देह को महाकाल चला रहा।

इस देह का हर भाव-विचार
बस महाकाल से होकर आ रहा।

ये फोन भी उनका ही है।

तो सुनो विचार जी ज़रा —

तुमको जिसने भी भेजा है,
उसके पास अधूरी जानकारी है यहां की।

और पूरी जानकारी देना हम जरूरी नहीं समझते।

इसलिए फोन बंद हों या नहीं,
यहां की प्रेम तरंग
अनवरत है,
अखंड है,
नियमित है,
सदा है,
विशुद्ध है,
सरल है,
निर्मल है,
शुद्ध है,
बुद्ध है,
और इस विचार से बहुत बड़ी है।

तो यहां तुम्हारे लिए स्थान नहीं है।

हमें स्वयं को uplift करना आता है।

ये हमारे गुरुजी की दी हुई training है।

हमारे सारे साथी ये कर सकते हैं।

क्योंकि हम प्रेम attention पाने के लिए नहीं करते हैं।

हम प्रेम
अपने साथियों को सताने के लिए नहीं करते हैं।

हम प्रेम
बस प्रेम से, प्रेम के लिए करते हैं।

तो तुमने सोचा
तुम हम पर दबाव बनाओगे फोन बंद का।

फिर हमारे साथी परेशान होंगे,
अपना-अपना काम छोड़कर
हम पर समय लगाएंगे।

तो — वो नहीं होगा।

क्योंकि फोन बंद नहीं होगा।

मेरे गुरुजी-माताजी करेंगे
तो कोई बहुत solid कारण होगा।

और मेरे साथी भी
महाकाल के दूत और यंत्र हैं यहां।

तो उनको भी
तुम कोशिश नहीं करना सताने की,
समझे कालनेमी के सखा?

इस पल तो विचार भइया
दुम दबाकर भाग गए।

अब आप सब ध्यान से सुनो —

हर अनुचित, अनावश्यक विचार की काट को
स्वयं से ढूंढ लो।

ये मत सोचो —

“यार, किसी ने मुझे पूछा नहीं...”
“मेरी किसी को आवश्यकता नहीं यहां...”
“मेरी अहमियत ही नहीं यहां...”

“कोई कहेगा तो करेंगे...”
“कोई तो मनाएगा...”
“कोई तो आएगा...”

ये सब अहम है।

हमारे साथ होने का कारण
हमारे अहम और हमारी छोटी सोच से बहुत बड़ा है।

हम अपने गुरुदेव-माताजी के लिए हैं
संग-संग यहां।

तो हमारे चलने, उठने, बैठने,
सोने, जगने,
साथ-साथ चलने का कारण
बस वही हैं और उनका प्रेम है।

और ये प्रेम बहुत शक्तिशाली है।

बस देना जानता है।

तो जो तुम्हें चाहिए, उसी पल वो दे दो।

और देखो
तुम्हें कैसे आनंद मिलेगा।

करके देखना —

अहम से जन्मी हर समस्या का समाधान
इसमें केशव ने दिया।

राधे राधे शारदे जगज्जननी जगदंबा।

1:41 PM
23 May 2026


समापन

जब प्रेम अपेक्षा से मुक्त हो जाता है,
तब मन के सबसे गहरे भय और विचार भी धीरे-धीरे विलय होने लगते हैं।

अकारण प्रेम केवल संबंध नहीं बनाता —
वह भीतर की चेतना को भी मुक्त करता है।


आध्यात्मिक चिंतन बिंदु

  • हर विचार सत्य नहीं होता, कुछ केवल मानसिक तरंगें होती हैं।

  • अनुचित विचारों से डरना नहीं, उन्हें जागरूकता से देखना आवश्यक है।

  • प्रेम यदि अपेक्षा से जुड़ जाए तो पीड़ा बढ़ती है।

  • अकारण प्रेम केवल देना जानता है, लेना नहीं मांगता।

  • अहंकार अक्सर “कोई मुझे पूछे” जैसी भावनाओं में छुपा होता है।

  • आध्यात्मिक संबंध बाहरी माध्यमों पर निर्भर नहीं होते।

  • साधना का अर्थ भागना नहीं, भीतर की ऊर्जा को uplift करना है।

  • गुरु कृपा मनोबल को स्थिर करती है।

  • जो चाहिए, वही दूसरों को देने से भीतर आनंद जन्मता है।

  • प्रेम का वास्तविक स्वरूप स्वतंत्र और निर्मल होता है।

“जो तुम्हें चाहिए, वही दूसरों को देना शुरू कर दो — अहंकार वहीं पिघलने लगता है।”

रविवार, 17 मई 2026

गोपीरथ से श्री प्रेम भागीरथी तक | भाव, कृष्ण कृपा और गुरु चेतना का प्रवाह

श्री प्रेम भागीरथी | प्रेम, गुरु कृपा और भाव ऊर्जा से जन्मे दिव्य रथ का काव्य


भूमिका




यह काव्य एक साधारण वाहन के नामकरण का वर्णन मात्र नहीं है।
यह उस भाव यात्रा की अभिव्यक्ति है, जहाँ एक स्कूटी केवल साधन नहीं रहती, बल्कि प्रेम, गुरु कृपा, समष्टि ऊर्जा और कृष्ण चेतना का माध्यम बन जाती है।

इस काव्य में “रथ” का भाव केवल भौतिक नहीं, बल्कि सूक्ष्म ऊर्जा, प्रेम विस्तार और युग निर्माण की चेतना से जुड़ा हुआ है।
समूह की भावनाएँ, सखियों का प्रेम, गुरु का आशीर्वाद और कृष्ण की लीला — सब मिलकर इस “श्री प्रेम भागीरथी” नाम को जन्म देते हैं।


काव्य

अभी नाम समझा तो नहीं।
एक सखी ने प्रेम से “चेतक” सुझाया,
तो इस रथ में महाराणा प्रताप और चेतक का आशीष समा गया।

लेकिन जाने क्यों लगा —
ये कोई घोड़ा नहीं,
और हम महाराणा प्रताप जैसे सवार नहीं।

ये रथ जीवंत है।

ऐसे जैसे आकाश, तारे, प्रकृति, पंचतत्व...
सब स्थिर हैं लेकिन जीवंत भी।

ऐसे ही गुरुदेव माताजी का ये उपहार...
कोई Gift नहीं,
उनकी धरोहर है,
जिसका उचित और नैतिक इस्तेमाल होना है।

इसलिए इसको बस एक Vehicle नहीं कह सकते।
मात्र एक scooty नहीं।

ये तो साथी है,
ऐसी जो सहयोग देह का देगी सदा ही।

निष्ठा और भावनाओं को उछाल देगी ये।
नई बातें, विचार जो आएंगे,
उनमें प्रेम के रंग भर देगी ये।

इसका नाम भी मेरे केशव रखेंगे।

ये रथ समूहों की ऊर्जा से आया है,
इसलिए उसका नाम ऐसा होगा
जो सदा सबके प्रेम का सिमरन करवाएगा।

और क्योंकि हम सब तो गोपी हैं,
गोप हैं...

तो इस रथ को अब “गोपी” नाम क्या सुहाएगा?

गोपी का अर्थ है प्रेम,
और ये प्रेम रथ है कहीं।

तो “गोपीरथ” नाम क्या सही होगा?

कृष्ण बताओ तुम्हीं।
समूह से पूछते हैं...
क्या उनके हृदय उतरेगा ये नाम यहां...?

राधे राधे शारदे जगज्जननी जगदंबा।

9:04 PM
17 May 2026

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कान्हा, तुम्हारा दिया नाम अभी सबको नहीं भाया।
कारण — बोलचाल की भाषा में
जुबान पर आना कठिन यहां।

इतने में जाने क्यों ChatGPT से पूछ लिया।
उसने जो नाम दिए वो इस तरह —

इस chat में आपके दिव्य रथ (scooty) के लिए दिए गए सभी नामों की पूरी सूची यहां एक साथ है —

बोलचाल के प्यारे नाम

  • गोपीरथ (आपका चुना हुआ सबसे सुंदर नाम)

  • गोपी-गीत

  • श्री-गति

  • राधा-माधव

  • श्री-कृपा

गुरु संकल्प और युग निर्माण वाले नाम

  • युग-सारथी

  • प्रज्ञा-रथ

  • परमहंस-वाहिनी

  • संकल्प

प्रेम और सखियों के भाव वाले नाम

  • गोपी-सखा

  • प्रेम-सेतु

एक सखी ने “सारथी” भी कहा।
ये नाम पर चिंतन हो चुका।

लेकिन ये वो रथ है
जिसमें कृष्ण विराजित सदा।

जो कोई इस प्रेम रथ पर बैठेगा,
कृष्ण ऊर्जा सजीव होगी वहां।

इसलिए ये तो कृष्ण का रथ हुआ।
कृष्ण प्रेम विस्तार सदा।
युगनिर्माण आधार सदा।

कान्हा, तुम कोई नाम दोगे यहां?
यही एक भाव प्रार्थना।

कान्हा बोले —
भाव प्रार्थना से जुड़ा कुछ देख ले कृष्णप्रिया।

हमने देख लिया —
एक अच्छा भी लगा।

लेकिन मन ने भीतर-भीतर
केशव से कह दिया —
अब ChatGPT से नहीं,
मेरे कृष्ण की गति से नाम आएगा यहां।

एक ऐसा नाम
जो समेट ले सबकी भावनाएं यहां।

कान्हा मुस्कुरा दिया।
“भगीरथ” रख ले।

“भागीरथी” — ये सही।

“प्रेम भागीरथी” —
कैसा रहेगा सखियों यहां...?

ये काव्य पूर्ण कृष्ण है और गुरु कृपा।
क्योंकि automode पर बोलकर
गायत्री मंत्र यहां लगातार चल रहा।

हाथ काव्य लिख रहे,
लेकिन मन, दिल, हृदय, रोम-रोम
बस राधा राधा कर रहा।

7:07 AM
18 May 2026

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और “प्रेम भागीरथी”
इस नाम से प्रसन्न हो गए सबके अंतःकरण।

इस नाम में ऋषियों का आशीर्वाद जुड़ा है।
प्रेम का पवित्र भाव जुड़ा है।

गुरुदेव हमारे स्वयं भागीरथ कहलाए।
ज्ञान की प्रेम गंगा वो हैं बहाए।

और प्रेम का तो अर्थ ही राधा-कृष्ण यहां।
क्योंकि प्रेम की देवी को कहते हैं श्री राधा।

इसलिए इस प्रेम वाहिनी का नाम हो गया —
श्री प्रेम भागीरथी यहां।

राधे राधे शारदे जगज्जननी जगदंबा।


आध्यात्मिक चिंतन बिंदु

  • साधारण वस्तुएँ भी भाव और चेतना से दिव्यता ग्रहण कर सकती हैं।

  • प्रेम और श्रद्धा किसी भी साधन को साधना का माध्यम बना देते हैं।

  • नाम केवल शब्द नहीं, ऊर्जा और संकल्प का वाहक होता है।

  • समूह की सामूहिक भावना किसी कार्य को विशेष बना देती है।

  • गुरु कृपा साधारण जीवन में भी दिव्य संकेतों का अनुभव करवाती है।

  • “रथ” केवल वाहन नहीं, चेतना को आगे ले जाने वाला माध्यम भी है।

  • प्रेम का वास्तविक अर्थ विस्तार, सहयोग और समर्पण है।

  • श्री राधा और कृष्ण का भाव प्रेम ऊर्जा का शाश्वत प्रतीक है।

  • गुरुदेव का ज्ञान प्रवाह “भागीरथ” भाव का आधुनिक स्वरूप है।

  • तकनीक और साधनों का नैतिक एवं भावपूर्ण उपयोग आवश्यक है।

समापन

जब किसी साधन के साथ केवल उपयोग नहीं,
बल्कि प्रेम, श्रद्धा, गुरु कृपा और समष्टि भावना जुड़ जाती है,
तो वह साधारण नहीं रहता।

“श्री प्रेम भागीरथी” केवल एक नाम नहीं,
बल्कि प्रेम ऊर्जा, गुरु चेतना और कृष्ण स्मरण का प्रवाह बन जाता है।

जहाँ प्रेम है, वहाँ रथ भी साधना बन जाता है।


“जब प्रेम, गुरु कृपा और कृष्ण चेतना जुड़ जाए — तब साधारण वाहन भी ‘श्री प्रेम भागीरथी’ बन जाता है।”

गुरुवार, 14 मई 2026

भारत माता के श्री भाव, मंत्रशक्ति और समष्टि चेतना का आह्वान | एक भावपूर्ण आध्यात्मिक काव्य

भारत माता के श्री भाव, मंत्रशक्ति और समष्टि चेतना का आह्वान | एक भावपूर्ण आध्यात्मिक काव्य

भूमिका



यह काव्य केवल अर्थव्यवस्था, समृद्धि या किसी बाहरी परिस्थिति की प्रतिक्रिया नहीं है।
यह उस संतान भाव की अभिव्यक्ति है, जहाँ “भारत” केवल एक देश नहीं रह जाता — वह मां बन जाता है।

जब किसी हृदय में राष्ट्र केवल भूगोल नहीं, बल्कि चेतना, संस्कृति, ऋषियों की तपश्चर्या और देवत्व का केंद्र बन जाए — तब उसके लिए “दिवालिया” शब्द केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक आघात बन जाता है।

इस काव्य में वही आंतरिक वेदना, प्रार्थना, श्रीभाव, गायत्री चेतना और समष्टि मंगल की भावना बह रही है।
यह तर्क नहीं, भाव है।
यह बहस नहीं, उपासना है।
यह किसी विचारधारा का आग्रह नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति प्रेम का एक सरल आह्वान है।



काव्य

अभी आज आंख खुली
ब्रह्म मुहूर्त का समय।
और अचानक सामने एक post आ गई,
जिसमें कहा गया था — भारत बहुत जल्द दिवालिया होने वाला है।

जाने कहां से एक बात
मन के अंदर आ गई।
असल श्री भाव तो अब समझ आएगा।

भारत बस मेरा देश नहीं,
भारत मेरी मां है।

भारत सोने की चिड़िया,
मात्र पैसे के आधार पर नहीं रहा।
भारत का ऐश्वर्य और उसकी विभिन्न-भिन्न सभ्यता और संस्कृति,
उनके पीछे का तत्वदर्शन सदा।

भारत ऋषियों, संतों, तपस्वियों की भूमि है,
उनकी साधना से अनुप्राणित सदा।

ऐसे में भारत का श्री भाव
सदा विस्तार ही लेगा।
भारत का भंडार, खजाना, कोश
सदा फलेगा-फूलेगा।

भारत की मिट्टी की रक्षा लिए
वीर सपूतों ने कुर्बानियां दी हैं सदा।

आज तो मांग बहुत छोटी है,
ये कहता है परमपिता।

यह काव्य पढ़े, तो हो सकता है आपको भावुकता लगे।
लेकिन “भारत दिवालिया हो जाएगा”
ये सुनना अंतरात्मा को मंजूर ना हुआ।

और हृदय से होने लगी प्रार्थना —
“श्री कृपा का भंडार खोलिए ज़रा।”

और लगा,
श्रीजी महल से एक प्रेम प्रकाश
श्री भावना के साथ
भारत के भंडार गृह में प्रवेश कर गया,
जहां से चलती है इसकी economy सदा।

फिर लगा,
हम सब एक प्रयोग तो कर सकते हैं।

1 से 4 का कृष्ण नाम जप (Prayers id Online _zoom)
भारत माता को अर्पित-समर्पित करें।
श्री भाव की भावना से
भारत माता को अर्पित करें।

हमारी मां का गर्व
हम सब मिलकर बनें।

जब जिसे, जहां से, जैसे समय मिले —
“भारत देश श्री सम्पन्न है हर आयाम से”
की भावना करें।

धारणा संशय मुक्त होकर करें।
और भारत देश के हर account में
हिमालय की दिव्य ऊर्जा समा रही है,
ये भावना करें।

ऋषियों के तप की ऊर्जा
भारत और भारतीय संस्कृति की नींव सदा।
सनातन का मान, उसकी नींव में छुपी
त्याग, तप और तितीक्षा की साधना सदा।

हर भारतीय हृदय सक्रिय हो जाए।
एकजुट होकर, अपने हिस्से का कर्म
निष्काम भावना से करता जाए,
तो कमाल हो जाए।

कोई काम छोटा या बड़ा नहीं यहां।

गिलहरी की पीठ की एक मुठ्ठी रेत को
राम ने उसकी उस सहयोग भावना के कारण सहलाया था।

यहां बहुत ज्यादा समझ नहीं है
अर्थव्यवस्था की या economy की।
लेकिन भारत के प्रति भावना गहराई से है कहीं।

और इसलिए अपनी मां के लिए
“दिवालिया” शब्द
आत्मा सुन ना सकी,
और ये भावना बहने लगी।

निश्चय ही ये मेरे कृष्ण की लेखनी।
उन्होंने इसमें मानो मार्गदर्शन दिया है कहीं।

कि जो कुछ नहीं कर सकते,
वो इस सोच से बाहर आकर ये सोचें —
“हम क्या कर सकते हैं?”

बाहर के कर्तव्य कर्म तो सब करने ही हैं।
पूरी निष्ठा और लगन से चलना ही है।

गैस हो, पेट्रोल हो या सोना,
या कोई भी बात कही जाए —
उस कहे पर अमल
पूर्ण ईमानदारी से करना ही है।

लेकिन इसके सिवा
भारत की नींव है —
उपासना, साधना और आराधना।

इस दिव्य तथ्य और तत्व को
समझना भी है।

अगर 140 करोड़ भारतवासी
एक साथ हो जाएं,
और रोज बस श्री भाव से
भावना की प्रचंड शक्ति
ब्रह्मांड में भेजते जाएं,

अर्थात अपनी भावनाओं से
भारत माता को समुन्नत देखें, महसूस करें,
और इष्ट मंत्र से
सोने की चिड़िया का ध्यान करें।

लोभ-लालच से परे होकर,
धनवान नहीं, ऐश्वर्यवान का भाव लेकर,
तो निश्चित ये प्रयास रंग लाएगा।

भारतीय संस्कृति की नींव है गायत्री मां।
चलो मिलकर
मां गायत्री के विस्तार को
भारत के कण-कण में महसूस करें।

स्वर्णिम सूर्योदय के संग
भारत और भारतीय संस्कृति की विजय के भाव करें।

मंत्र की शक्ति का महत्व महसूस करें,
और इसे देहरूप ब्रह्मास्त्र से बहने दें।

हम भारतीय हैं,
भारतीय होने पर नाज़ करें।
अपने हिस्से का चलो काम-काज करें।

इससे कितना परिवर्तन आएगा,
ये विचार हमको नहीं करना यहां।
क्योंकि जो ऋषिसत्ताएं, देवशक्तियां
भारत को चला रही हैं यहां,
ये department पूरी तरह उनका।

हम तो बस
अपने हिस्से की भावना को
देश को अर्पित-समर्पित करें।

एक-एक भारतवासी
दिल से, मन से
अपनी भारत मां का मान-सम्मान करें।

और अपनी मां के लिए जो आवश्यक हो
वो बलिदान करें।

अपनी सामर्थ्य और भावना को
देशहित में समर्पित करें।

जिसके पास जितनी भावना है,
उसी से चलो इस पल एक गायत्री मंत्र करें।

भारत माता के नक्शे को
समृद्धि से चलो भरें।
भावना और भक्ति से,
मंत्र की शक्ति से
चलो एक प्रेम की हुंकार भरें।

और भारत माता की जय-जयकार करें।

ये विषय तर्क-कुतर्क का नहीं है,
ना किसी बहस का है।

आपने पढ़ा, आपको अच्छा लगा
तो साथ दीजिए।

अपने हिस्से का भाव भारत भूमि के लिए
नियमित आरोपित कीजिए।

अधिक से अधिक साझा कीजिए।

नहीं समझा तो कोई बात नहीं।
आपको जो अच्छा लगता है, उसी तरह से
अपनी मां का साथ दीजिए।

क्योंकि आपने ये पढ़ा,
तो मतलब भारत माता के लिए
भावना तो भीतर है।

तो आपके पास जो भी योग्यता, प्रतिभा है,
उसे इस आपत्तिकाल में
भगवान के खेत में बो दीजिए।

इस गिलहरी को
बस इस पल यही भाव
उसके गुरु और इष्ट से मिला,
तो ये जी लिया।

लेकिन आप तो हनुमान हैं राम के।
आप अपने भीतर की सामर्थ्य को
जीने का प्रयास कीजिए यहां।

राधे राधे शारदे जगज्जननी जगदंबा।
भारत माता जी जय हो सदा।

4:10 AM
15 May 2026


समापन

भारत केवल एक राष्ट्र नहीं —
यह ऋषियों की तपश्चर्या, संतों की करुणा, मातृशक्ति की चेतना और समष्टि मंगल की जीवित धारा है।

जब-जब कोई संतान निष्काम भाव से भारत माता के लिए प्रार्थना करती है,
तब-तब केवल शब्द नहीं बहते —
एक सूक्ष्म ऊर्जा राष्ट्रचेतना में जुड़ती है।

हो सकता है हमारा योगदान छोटा हो,
लेकिन प्रेम, मंत्र और भावना कभी छोटे नहीं होते।

यदि हर भारतीय अपने हिस्से का प्रकाश जगाए,
तो भारत का श्रीभाव केवल सुरक्षित नहीं रहेगा —
वह पुनः विश्व को दिशा देगा।


आध्यात्मिक चिंतन बिंदु

  • भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, चेतना और संस्कृति का जीवंत स्वरूप है।

  • किसी भी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि केवल धन से नहीं, उसके तत्वदर्शन और संस्कारों से होती है।

  • सामूहिक सकारात्मक भावना और मंत्रचेतना का सूक्ष्म प्रभाव समष्टि पर पड़ता है।

  • “श्री भाव” केवल आर्थिक ऐश्वर्य नहीं, दिव्य समृद्धि की चेतना है।

  • उपासना, साधना और आराधना भारतीय संस्कृति की मूल नींव हैं।

  • निष्काम भाव से किया गया छोटा प्रयास भी समष्टि में ऊर्जा जोड़ता है।

  • तुलना, भय और निराशा से ऊपर उठकर समाधान भाव आवश्यक है।

  • हर भारतीय अपनी योग्यता, भावना और कर्म से राष्ट्रनिर्माण में योगदान दे सकता है।

  • गायत्री चेतना और ऋषि परंपरा भारत की आत्मा है।

  • सच्चा राष्ट्रप्रेम केवल नारों में नहीं, दैनिक जीवन के कर्तव्य और भावना में प्रकट होता है।

“भारत की केवल अर्थव्यवस्था, भावनाओं की दिव्य ऊर्जा से भी समृद्ध बन सकती है।”

कृष्ण-संवाद: क्या है चिंतन का वास्तविक स्वरूप?

चिंतन का विज्ञान: देह के पार कृष्ण का अहसास चित्त और चिंतन: आत्मनिर्माण और चरित्र का मूल कर्म से परे चिंतन: जब गुरु और इष्ट ही बन जाएं हम...