मंगलवार, 5 मई 2026

जब ‘मैं’ मिटा — गुरु ने नया गढ़ा: समर्पण, स्वभाव और महाकाल की लीला

मैं कौन हूँ? जब सब गुरुदेव पर छोड़ दिया — तब जीवन स्वयं प्रकट हुआ


भूमिका (Bhoomika)



यह काव्य एक साधक की उस अवस्था को प्रकट करता है, जहाँ “मैं” का बोध धुंधला पड़ने लगता है।
गुरु, महाकाल और इष्ट के प्रति पूर्ण समर्पण में, जीवन स्वयं घटित होता हुआ अनुभव होता है।
यहाँ प्रश्न नहीं, उत्तर नहीं — केवल होने की अनुभूति है।
यह काव्य ‘करने’ से ‘होने’ की यात्रा का साक्षी है।


काव्य (Kavya)

ठाकुर हम क्या जी रहे हैं
ये तुम जान सकते हो और
बस तुम
क्योंकि हम तो कुछ जान ही नहीं पा रहे
स्वयं को ही पहचान नहीं पा रहे
तुम हो, ये आभास है
तुम्हारा पल-पल है, बाबा साथ है
गुरुदेव माताजी के मार्गदर्शन से चल रही हर सांस है
जीवन तो ये गुरुदेव का हो गया
उनके होने से ही है सांस यहां
और अब गुरुदेव इस यंत्र से क्या कर रहे हैं या क्या करेंगे,
इसका अनुमान नहीं है यहां
बस जो होना है, वो हो रहा

ये सब सुबह लिखा गया था
फिर जाने क्यों आगे नहीं बढ़ा
इस पल shantikunj में गुरुदेव की प्रतिमा के दर्शन हुए
तो बस मानो मुंह से निकल गया —
अपने में समा लो
या मुझमें समा जाओ
अंतर क्या?
लेकिन इस बूंद का विस्तार तुमसे है सदा
और विस्तार की चाह नहीं
विस्तार इस युग की आवश्यकता है
अब जो होना है, अपने आप हो रहा
क्या हो रहा, इसकी नहीं परवाह यहां
क्योंकि हर सांस पर महाकाल का अधिकार है सदा

फिर अचानक एक अहसास हुआ
जब मैं इला थी,
तो क्या मुझे स्वयं को ये बार-बार बताना पड़ता था
कि मैं इला हूं...?
नहीं, क्योंकि वो सहज था
अवचेतन के भीतर गहरा था
संशय रहित था
जैसे कुछ बातें ऐसी होती हैं जो बस हैं, सदा हैं
उन्हें ना बार-बार दोहराना होता
ना स्वयं को या किसी को बताना होता

सूर्य स्वयं को ये नहीं बताता कि मैं सूर्य हूं
और ना किरणों को आदेश देना होता कि तुम निकलो और विस्तार लो,                             संसार को प्रकाशित करो                                                                                                     नाक स्वयं को नहीं बताती कि वो नाक है और उसे सांस लेनी है

वो नाक है और सांस लेना उसका स्वभाव है
हर इंद्रिय ऐसे ही कार्य करती, अपने स्वभाव अनुसार चलती है
और फिर जब इंद्रियां ही जब इष्ट हो जाएं, तो इष्ट ही स्वभाव हो जाता यहां

इसी प्रकार मुझे स्वयं को कुछ कहने- बताने की आवश्यकता नहीं
मैं कौन हूं, मेरे महाकाल जानते हैं
क्योंकि उन्होंने ही निर्माण किया है
और ना मुझे ये किसी को जताने की आवश्यकता कहीं
क्योंकि ये सब करना, बताना, जताना
इस बात को प्रमाणित करेगा
कि मुझे मेरे... वो होने में संशय है, जो महाकाल की चाह है

महाकाल ने निर्माण किया है
और मैं वही हूं, जो उन्होंने मुझे बनाया है
मेरे मूर्तिकार, मेरे गुरु ही मेरे महाकाल हैं
मेरे शिल्पकार मेरे नवनिर्माण में सतत लगे हैं
मुझे बस ये नवनिर्माण होने देना है

मेरे शिल्पकार के छेनी-हथौड़े उनका प्रेम हैं
उनका स्नेह, आशीर्वाद है
दिखाई छेनी-हथौड़े जैसे देते हैं
लेकिन बहुत कोमल मेरे शिल्पकार के हाथ हैं
उनकी नियत मेरे उद्धार की है
और भावना अनंत गहराई से प्यार की है

इसलिए बनाने के बाद वो कहें अगर कि ये राम जी की मूर्ति बनी —
तो मान लो
वो कहें कि हनुमान की बनी — तो मान लो
वो कहें एक सजीव प्रतिमा गायत्री की तैयार करी — तो मान लो
वो जो कहें, उसे बस जीने लगो
क्योंकि उन्होंने बनाया है, तो उन्हें पता होगा क्या बना

अपने को कैसे पता चलेगा
क्योंकि बना ही तब, जब अपना गल गया

जो आंखें सारी दुनिया देखती हैं
वो स्वयं को ही नहीं देख सकती हैं
स्वयं को देखने के लिए दर्पण का सहारा लगता है सदा
और मेरे गुरु ही मेरी आत्मा का दर्पण हैं यहां

अब इस दर्पण में देखने लगे हम, सखा
तो आंख बहने लगी प्रेम से यहां
अकारण प्रेमाश्रु बह गया
ना कुछ देखने के लिए रहा
ना कहने, ना पूछने के लिए

बस वो और मैं यहां
और बस वो ही वो शेष रह गए, सखा

और अब नेत्र बंद हो गए
और राधा राधा चलने लगा
और ये तो अनंत है, अनंत तक चलेगा
अनंत यात्रा का एक पल

एक आयाम, एक अहसास लिपिबद्ध हो गया
राधा राधा राधा
बस गुरु कृपा

2.23 PM
4 May 2026


संक्षिप्त सारांश

यह काव्य ‘स्व’ के विलय और गुरु के हाथों नवनिर्माण की अनुभूति को दर्शाता है।
जब साधक “मैं कौन हूँ” को छोड़ देता है, तब जीवन स्वयं गुरु की योजना अनुसार चलने लगता है।
यहाँ हर क्रिया, हर श्वास महाकाल के अधिकार में अनुभव होती है।
अंततः केवल प्रेम, समर्पण और इष्ट का प्रवाह ही शेष रह जाता है।


आध्यात्मिक चिंतन बिंदु

सच्चा समर्पण तब होता है जब ‘मैं’ का बोध मिटने लगे

  • साधना का उद्देश्य मन और संस्कारों से ऊपर उठकर शुद्धता में स्थापित होना है
  • प्रारंभ में प्रयास और अनुशासन आवश्यक हैं, पर अंत में सहजता प्रकट होती है
  • शुद्ध, गुरु-संस्कारित स्वभाव साधना की उच्च अवस्था है
  • लेकिन अंतिम सत्य में स्वभाव का भी अतिक्रमण होता है
  • जहाँ न ‘मैं’ रहता है, न ‘मेरा स्वभाव’ — केवल इष्ट का प्रवाह होता है
  • गुरु ही उस अवस्था तक ले जाने वाले सच्चे दर्पण और मार्गदर्शक हैं
  • गुरु ही आत्मा का वास्तविक दर्पण हैं
  • जो बना रहा है, वही जानता है क्या बना रहा है
  • करुणा और प्रेम ही नवनिर्माण के वास्तविक उपकरण हैं
  • अनुभव शब्दों से परे है — उसे केवल जिया जा सकता है


समापन

जब साधक स्वयं को छोड़ देता है, तब गुरु उसे अपने अनुसार गढ़ते हैं।
यह यात्रा करने की नहीं, होने की है।
जहाँ अंत में न प्रश्न बचता है, न उत्तर —
केवल प्रेम, केवल इष्ट, केवल ‘वो’ ही शेष रह जाता है।


“जब ‘मैं’ मिट गया — तब गुरु ने असली ‘मैं’ गढ़ दिया।”

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