सोचने लगे — संस्कार होते हैं क्या?
कुछ इम्प्रिंट कई जन्मों के,
कुछ इधर-उधर के…
जहाँ से जो सीख लिया,
जिसका अभ्यास हुआ,
वही संस्कार बन गया।
आवश्यक या अनावश्यक से परे,
एक आदत — इस पल कह सकते हैं यहाँ…
मूल में तो यह भी सत्-रज-तम का खेल हुआ।
जो संस्कार अच्छे हैं,
वे सात्त्विक कहलाते हैं।
जो हमें नहीं जमते,
वे रज-तम में गिने जाते हैं।
इसमें भी यह दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।
एक संस्कार जो मुझे उचित और सही लगता है,
हो सकता है सामने वाले को न जँचे।
सही सोच रहे हैं न हम, सखा…?
और बाकी आत्मा का तो कोई संस्कार है नहीं।
आत्मा तो मूल में बस प्रेम का प्रकाश ही है।
प्रेम… तो कोई गुण है नहीं,
वह तो ब्रह्मांडीय ऊर्जा है,
अकारण बह रही,
और अनवर्चनीय कहीं।
तो अब बस एक भावना है,
प्रार्थना है —
उचित हो तो स्वीकार करो,
बाकी ज़िद कोई नहीं।
जब यह भाव हो गया
कि उचित-अनुचित सब तुम ही,
धर्म-अधर्म से परे ही,
अच्छे-बुरे से परे ही
ईश्वर का एहसास है,
तो यह मेरा संस्कार क्या होता है?
अब प्रभु, करो ऐसी कृपा
कि देह-रूप इस यंत्र का हर संस्कार भी तुम हो —
यह हो जाए भावना…
क्या अच्छा, क्या बुरा,
क्या सही-गलत की जाँच करें हम, सखा?
तुम ही बस देह से खेलो लीला।
अच्छी या बुरी — भेद कहाँ?
और जो भेद करे,
वह देह-भाव ही तो है, सखा।
और तुम्हारे होते कुछ अनुचित नहीं हो सकता।
तुम बस वही करोगे जो समष्टि के मंगल का होगा।
कृष्ण ही कृष्ण से खेल रहा —
यही तो बर्बरीक ने महाभारत के अंत में देखा।
माना हम एक साधारण जीव हैं,
लेकिन हैं तो तुम्हारे ही अंश, सखा।
तुमसे ही तो जन्म हुआ।
कृष्ण मुस्कुरा उठे।
बोले — “मुझमें-तुझमें भेद कहाँ?”
और बस एक ही जाँच है, कृष्ण-प्रिया —
भीतर से उठा हर भाव यह देखो
कि क्या सबको आनंद दे रहा है?
समष्टि के मंगल का है क्या?
भीतर बस प्रेम होना चाहिए —
सबके लिए 10/10।
हर योनि, हर जीव के प्रति करुणा है क्या?
सामने वाले के व्यवहार अनुसार धारणा बनती है क्या?
दोष-दृष्टि बाकी है क्या?
सबको जज करते हो क्या?
और भी बहुत सारे पैरामीटर हैं, कृष्ण-प्रिया,
लेकिन जहाँ यह सब है,
वहाँ जीव सत्-रज-तम से मुक्त नहीं हो पाता।
सत्-रज-तम से मुक्त अवस्था
तो भीतर सुकून अनुभव करती है,
हर पल मुस्कुराती है — तेरी तरह।
विचार-शून्य रहती है,
मेरी प्रीति में बस खोई रहती है।
इसका प्रमाण नहीं।
यह प्रेम प्रमाण से परे है,
और इसका परिमाण बस प्रेम है।
प्रेमी जो होता है,
उसे संसार के मान-सम्मान का चिंतन नहीं होता।
उसे संसार का ही चिंतन नहीं होता।
उसका इष्ट ही उसका संसार होता है,
और सारे संसार से उसे स्नेह अपार होता है।
लेकिन उस देह से कब क्या होगा, उसे नहीं पता,
क्योंकि वह तो मेरी लीला का हिस्सा हुआ न।
उस देह का हर भाव-विचार में ही हूँ सदा।
लेकिन इस अवस्था को संसार समझ जाए —
एक पल में यह संसार सँवर जाए…
लेकिन ठाकुर को हृदय न समझ सके,
संग रहकर भी — सोचो, यह कितना कठिन!
गुरुदेव-माताजी तो सबके लिए उपलब्ध हैं,
लेकिन उनकी लेखनी को पढ़कर भी
स्वाध्याय लोग कहाँ करते हैं?
अध्याय की तरह पढ़ते हैं,
और अध्ययन दूसरों का करते हैं।
स्व के अध्ययन के लिए स्वाध्याय कहा गया,
लेकिन अपना अध्ययन करता कौन यहाँ?
दूसरों में कमी देखने की जिनकी आदत है,
उनका सुधार तो भगवान भी नहीं कर सकता।
इसलिए तो कहते हैं —
- संस्कार दृष्टिकोण पर निर्भर हैं
- आत्मा का कोई संस्कार नहीं — वह प्रेम है
- सत्–रज–तम से परे ही शांति है
- समष्टि का मंगल ही सही कसौटी है
- स्वाध्याय = स्वयं का अध्ययन
- अपना सुधार ही सेवा
- क्या मैं दूसरों को जज करता हूँ?
- क्या मैं स्वाध्याय करता हूँ या पर-अध्ययन?
- क्या मेरा हर भाव समष्टि के मंगल का है?
- क्या मैं देह-भाव से निर्णय ले रहा हूँ?
10:14 PM
27 Feb 2026
Shreepriya
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