जब सब कुछ राधा ही रह जाए — नाम, नामी और साधक का अद्वैत अनुभव
भूमिका
भक्ति की कुछ अवस्थाएँ ऐसी होती हैं जहाँ साधक और साध्य के बीच का भेद धीरे-धीरे मिटने लगता है। नाम जप केवल शब्द नहीं रहता, बल्कि चेतना की एक निरंतर धारा बन जाता है। इस काव्य में वही अनुभव व्यक्त हुआ है, जहाँ साधक को अपने भीतर, अपने भावों में, अपने जप में — हर ओर केवल राधा ही राधा का अनुभव होने लगता है।
यह काव्य नाम, नामी और साधक के अद्वैत को सहज और प्रेममय भाषा में प्रकट करता है।
काव्य
ये राधा राधा राधा हो रहा है।
मुझमें मेरा कुछ है तो बस राधा है...
ये अहसास भी मेरा नहीं।
क्योंकि मेरा कहने को तो बस राधा ही रह गई।
और फिर राधा जिसे अपना कह दें,
उसके लिए तो मन प्राण न्योछावर हो जाते हैं यूँ ही।
क्योंकि राधा ही राधा को न्योछावर करती है।
यहाँ तो कुछ है तो बस राधा और राधा नाम की मस्ती है।
ये मस्ती भी मैं नहीं।
क्योंकि ये भी राधा ही है कहीं।
सब कुछ राधा ही है।
और राधा ही बस प्रकट हर भाव से हो रही है।
नाम भी राधा है, और नाम की ऊर्जा भी राधा है।
नाम करने वाला भी राधा है।
नाम पढ़ने, सुनने, गाने वाला भी राधा है।
नाम हो रहा है या नहीं हो रहा —
से परे जो है, वो भी राधा है।
क्योंकि करने से होगा नहीं,
और छोड़ने से छूटेगा नहीं।
क्योंकि ये इन दोनों से परे है सदा ही।
पकड़ने वाला बाकी है ..
तो नाम हो ही नहीं सकता।
और छोड़ने वाला बाकी है ..
तो नाम बह नहीं सकता।
क्योंकि नाम ही नाम को करता यहाँ,
और नाम और नामी एक हैं सदा।
यही तो कहती है माँ।
सभी ऋषि संत यही तो कहते हैं सदा।
और अब राधा ही राधा हो रहा।
बस हो रहा।
क्यों, कैसे, क्यों, कब, कहाँ —
कुछ नहीं पता।
कौन कर रहा, जाने माँ।
हो रहा का अहसास है।
क्योंकि ये अहसास ही राधा है यहाँ।
और यूँ तो इस पल बोलकर भी नहीं हो रहा,
क्योंकि हो रहा।
बस बोलकर ही होगा तो कोई गूँगा कैसे करेगा।
इसलिए नाम बोलने या करने की नहीं,
भावना की ऊर्जा है सदा।
भाव एक बार गुरु को अर्पित हुआ,
तो वही देते हैं दिशा सदा।
इस पल तो बस है राधा राधा और राधा यहाँ,
और वहाँ भी जहाँ ये गया।
तुमने पढ़ा तो राधा ही ने तो पढ़ा।
तुमने हँसा तो राधा जी ने ही तो हँसा।
और तुमने पागल, बावली, दीवानी राधा राधा वाली कहा —
तो भी राधा जी ने ही तो कहा।
क्योंकि राधा जी ये हमारे लिए लिखा,
मेरे या तेरे लिए नहीं।
क्योंकि वो मेरे तेरे से बाहर है सदा ही।
आपने पढ़ा तो गिनो तो कितनी बार राधा राधा राधा कहा।
अरे अरे रुको ... ChatGPT (Technolgy) से नहीं पूछना।
स्वयं से गिनो ज़रा — कितनी बार राधा राधा राधा लिखा,
कितनी बार राधा राधा राधा जपा,
कितनी बार राधा राधा राधा पढ़ा,
और कितनी बार राधा राधा राधा गुना...
गिन लिया...? बहुत समय गिनने में लगा ना।
जाने कितना राधा राधा है इस काव्य में लिखा हुआ।
आपका ये समय नाम जप और राधा नाम चिंतन में चला गया।
और यहीं से बस समझो... मैजिक हो गया।
क्योंकि राधा नाम तो कोई एक बार कहे तो अनंत जन्म तर जाते हैं।
आपने तो गुरुशरण होकर ना जाने कितनी बार यहाँ राधा पढ़ा, सुना, जपा, गुना...
और यही तो है मेरी श्री जी कृपा।
अब बताओ तो टोटल कितना राधा राधा राधा हुआ? 😃
राधे राधे शारदे जगतजननी जगदंबा।
राधे राधे शारदे जगतजननी जगदंबा।
राधा राधा राधा राधा राधा।
और बस राधा राधा राधा राधा राधा और बस राधा।
इसके सिवा जो बचा वो भी बस राधा राधा राधा राधा राधा।
क्योंकि इसके सिवा कुछ है कहाँ।
और जो है वो बस राधा ही है सदा सदा,
और बस राधा ही है सदा सदा — यही गुरुजी ने कहा।
यही अहसास और अनुभव है यहाँ का,
और यहाँ तो है बस राधा राधा राधा सदा।
अरे कृष्ण अब बस करो।
गिनने वाला गिनेगा कैसे,
इतना राधा राधा लिख रहे हो।
और कृष्ण मुस्कुराने लगा।
बोला — गिनकर किया तो क्या किया...
मैंने तो इसलिए इतनी बार लिखा कि चिंतन ही बस एक सबका राधा हो जाए।
यही एक मात्र कृष्ण की इस पल चाहा।
राधे राधे शारदे जगतजननी जगदंबा।
संक्षिप्त सारांश
यह काव्य नाम जप की उस अवस्था को व्यक्त करता है जहाँ साधक, नाम और नामी के बीच का भेद मिटने लगता है। साधक को अपने भीतर और बाहर हर ओर केवल राधा का अनुभव होने लगता है। यहाँ जप प्रयास से नहीं होता, बल्कि स्वयं बहता है। अंततः यह अनुभव साधक को अद्वैत की उस स्थिति में ले जाता है जहाँ सब कुछ राधा ही प्रतीत होता है।
आध्यात्मिक चिंतन बिंदु
• नाम जप का अंतिम अनुभव अद्वैत की अनुभूति तक ले जा सकता है।
• जब साधक का अहंकार ढीला पड़ता है, तब जप करने वाला भी उसी नाम में विलीन होने लगता है।
• राधा नाम केवल शब्द नहीं, बल्कि प्रेम चेतना की ऊर्जा है।
• गुरु को अर्पित किया गया भाव साधना की दिशा स्वयं निर्धारित कर देता है।
• सच्ची भक्ति में साधक, साध्य और साधना एक हो जाते हैं।
समापन
जब नाम का जप साधक के प्रयास से हटकर स्वयं बहने लगता है, तब वही भक्ति की उच्च अवस्था होती है। उस स्थिति में व्यक्ति को हर ओर उसी नाम का अनुभव होता है। यही प्रेम और नाम की परम लीला है — जहाँ अंततः सब कुछ राधा ही रह जाता है।
राधे राधे शारदे जगतजननी जगदंबा 🌸
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